श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.103.46 
विगर्हमाण: कैकेयीं मन्थरासहितामपि।
अभिगम्य जनो रामं बाष्पपूर्णमुखोऽभवत्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
श्री राम के पास जाते ही सबके चेहरे आँसुओं से भीग गए और मंथरा सहित सभी लोग कैकेयी की निन्दा करने लगे।
 
On going to Sri Rama, everyone's face became wet with tears and everyone, including Manthra, began to criticise Kaikeyi.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)