श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.103.38 
अचिरप्रोषितं रामं चिरविप्रोषितं यथा।
द्रष्टुकामो जन: सर्वो जगाम सहसाश्रमम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि श्रीराम को परदेश में आये हुए कुछ ही दिन हुए थे, तथापि लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे वहाँ बहुत दिनों से रह रहे हों; अतएव सब लोग उनके दर्शन की इच्छा से अचानक आश्रम की ओर चल पड़े।
 
Although it had been only a few days since Sri Rama had come to a foreign land, yet it appeared to the people as if He had been staying there for a long time; therefore everybody suddenly set out towards the Ashram with the desire to see Him. 38.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas