श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.103.29 
ऐङ्गुदं बदरैर्मिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे।
न्यस्य राम: सुदु:खार्तो रुदन् वचनमब्रवीत्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
उसने इंगुदी वृक्ष के गूदे में बेर मिलाकर उसका आटा तैयार किया और उसे बिछे हुए कुशा पर रखकर रोते हुए तथा महान दुःखी होकर यह वचन कहे -॥29॥
 
He prepared a dough of it by mixing plums with the pulp of the ingudi tree, and placing it on the spread kusha grass, he said these words while crying and being in great sorrow -॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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