श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.103.13 
पुरा प्रेक्ष्य सुवृत्तं मां पिता यान्याह सान्त्वयन्।
वाक्यानि तानि श्रोष्यामि कुत: कर्णसुखान्यहम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'पहले जब मैं उनकी आज्ञा का पालन करता था, तो मेरा अच्छा व्यवहार देखकर वे मुझे प्रोत्साहित करने वाली बातें कहते थे। अब मैं किसके मुँह से वे शांतिदायक बातें सुनूँगा?'
 
'Earlier when I used to obey some of his orders, on seeing my good behaviour he used to say things to encourage me. From whose mouth will I hear those soothing words now?'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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