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श्लोक 2.102.9  |
त्वामेव शोचंस्तव दर्शनेप्सु-
स्त्वय्येव सक्तामनिवर्त्य बुद्धिम्।
त्वया विहीनस्तव शोकरुग्ण-
स्त्वां संस्मरन्नेव गत: पिता ते॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| ‘तुम्हारे पिता तुम्हारे वियोग में शोक से व्याकुल हो गए और तुम्हारे शोक में डूबकर केवल तुम्हारा ही दर्शन करने की इच्छा रखते हुए, तुमसे मन न मोड़ते हुए तथा केवल तुम्हारा ही स्मरण करते हुए स्वर्गलोक को चले गए।’॥9॥ |
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| 'Your father, on being separated from you, became ill due to grief and immersed in your grief, desiring to see you only, not turning his mind away from you, and remembering you only, he went to heaven.'॥ 9॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वॺधिकशततम: सर्ग:॥ १०२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२॥ |
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