श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 101: श्रीराम का भरत से वन में आगमन का प्रयोजन पूछना, भरत का उनसे राज्य ग्रहण करने के लिये कहना और श्रीराम का उसे अस्वीकार कर देना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.101.27 
यदब्रवीन्मां नरलोकसत्कृत:
पिता महात्मा विबुधाधिपोपम:।
तदेव मन्ये परमात्मनो हितं
न सर्वलोकेश्वरभावमव्ययम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'मैं अपने लिए यह परम हितकर समझता हूँ कि मेरे पितामह, जो मनुष्यलोक में आदरणीय हैं और देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी हैं, ने मुझे वन जाने की आज्ञा दी है। उनकी आज्ञा के विरुद्ध भी ब्रह्माजी का अमर पद मेरे लिए हितकर नहीं है।' 27॥
 
'I consider it to be most beneficial for me that my great father, who is respected in the human world and as brilliant as Devraj Indra, has ordered me to go to the forest. Even against his orders, the immortal position of Lord Brahma is not beneficial for me. 27॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाधिकशततम: सर्ग:॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०१॥*
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)