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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 101: श्रीराम का भरत से वन में आगमन का प्रयोजन पूछना, भरत का उनसे राज्य ग्रहण करने के लिये कहना और श्रीराम का उसे अस्वीकार कर देना
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श्लोक 17
श्लोक
2.101.17
न दोषं त्वयि पश्यामि सूक्ष्ममप्यरिसूदन।
न चापि जननीं बाल्यात् त्वं विगर्हितुमर्हसि॥ १७॥
अनुवाद
शत्रुसूदन! मैं तुममें किंचितमात्र भी दोष नहीं देखता। तुम्हें अज्ञानवश अपनी माता की भी निन्दा नहीं करनी चाहिए॥17॥
'Shatrusudan! I do not see even the slightest fault in you. You should not criticise even your mother out of ignorance.॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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