श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  2.100.73 
कच्चिदेषैव ते बुद्धिर्यथोक्ता मम राघव।
आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थसंहिता॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हारा मन भी उसी विचार का है न? क्योंकि इस विचार से आयु और यश की वृद्धि होती है तथा धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि होती है।
 
Raghunandan! Whatever I have said, your mind is also of the same opinion, isn't it? Because this thought increases age and fame and leads to the accomplishment of Dharma, Kama and Artha. 73.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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