| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना » श्लोक 61 |
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| | | | श्लोक 2.100.61  | कच्चिद् गुरूंश्च वृद्धांश्च तापसान् देवतातिथीन्।
चैत्यांश्च सर्वान् सिद्धार्थान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि॥ ६१॥ | | | | | | अनुवाद | | क्या तुम अपने गुरुजनों, वृद्धजनों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्यवृक्षों और सम्पूर्ण संतुष्ट ब्राह्मणों को नमस्कार करते हो?॥ 61॥ | | | | ‘Do you salute your teachers, the elderly, ascetics, gods, guests, Chaitya trees and all the fully satisfied brahmins?॥ 61॥ | | ✨ ai-generated | | |
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