श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  2.100.59 
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि राघव।
तानि पुत्रपशून् घ्नन्ति प्रीत्यर्थमनुशासत:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
'रघुनन्दन! जो निर्दोष होते हुए भी झूठे अभियोग और दण्ड पाते हैं, उनके नेत्रों से जो आँसू गिरते हैं, वे पक्षपातपूर्वक शासन करने वाले राजा के पुत्रों और पशुओं का नाश कर देते हैं ॥ 59॥
 
'Raghunandan! The tears that fall from the eyes of those who are falsely accused and punished despite being innocent, destroy the sons and animals of the king who rules with partiality. ॥ 59॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd