श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.100.56 
कच्चिदार्योऽपि शुद्धात्मा क्षारितश्चापकर्मणा।
अदृष्ट: शास्त्रकुशलैर्न लोभाद् बध्यते शुचि:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
क्या कभी ऐसा होता है कि कोई मनुष्य शास्त्रज्ञ विद्वानों से परामर्श किए बिना ही लोभवश किसी सज्जन, निर्दोष और शुद्धात्मा पुरुष पर दोष लगाकर उसे आर्थिक दंड दे दे?॥ 56॥
 
‘Does it ever happen that a person accuses a noble, innocent and pure souled person and gives him a financial penalty out of greed without even consulting scholars skilled in the knowledge of scriptures?॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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