श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.100.55 
देवतार्थे च पित्रर्थे ब्राह्मणाभ्यागतेषु च।
योधेषु मित्रवर्गेषु कच्चिद् गच्छति ते व्यय:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारा धन तो देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों, अभ्यागतों, योद्धाओं और मित्रों के लिए ही व्यय होता है न?॥ 55॥
 
‘Your wealth is spent only for the gods, ancestors, brahmins, visitors, warriors and friends, isn't it?॥ 55॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd