श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.100.50 
कच्चिन्नागवनं गुप्तं कच्चित् ते सन्ति धेनुका:।
कच्चिन्न गणिकाश्वानां कुञ्जराणां च तृप्यसि॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जिन वनों में हाथी उत्पन्न होते हैं, वे आपके द्वारा रक्षित हैं न? आपके पास दूध देने वाली गायें तो बहुत हैं न? (या हाथियों को पकड़ने के लिए आपके पास हथिनियों की कमी है न?) क्या आप हथिनियों, घोड़ों और हाथियों के संग्रह से कभी संतुष्ट नहीं होते?॥50॥
 
‘The forests where elephants are born are protected by you, aren't they? You have a large number of milk-giving cows, aren't you? (Or do you have a shortage of female elephants to trap elephants?) Are you never satisfied with your collection of female elephants, horses and male elephants?॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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