श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.100.5 
चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम्।
दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
आज मैं बहुत दिनों के बाद इस वन में भरत को देख रहा हूँ, जो बहुत दूर से (अपने नाना के घर से) आया है; परन्तु उसका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया है। हे पिता! आप वन में किसलिए आए हैं?॥5॥
 
'Today I am seeing Bharata in this forest after a long time, who has come from far away (from his maternal grandfather's house); but his body has become very weak. O father, why have you come to the forest?॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)