श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.100.47 
कच्चित् ते दयिता: सर्वे कृषिगोरक्षजीविन:।
वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
तात! कृषि और गोरक्षा से जीविका चलाने वाले समस्त वैश्य आपके प्रिय हैं न? क्योंकि कृषि और व्यापार आदि में लगे रहने पर ही यह संसार सुखी और उन्नत होता है ॥47॥
 
‘Tat! All the Vaishyas who earn their livelihood from agriculture and cow protection are your favourites, aren't they? Because this world becomes happy and progressive only when engaged in agriculture and trade etc. 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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