| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना » श्लोक 40-42 |
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| | | | श्लोक 2.100.40-42  | वीरैरध्युषितां पूर्वमस्माकं तात पूर्वकै:।
सत्यनामां दृढद्वारां हस्त्यश्वरथसंकुलाम्॥ ४०॥
ब्राह्मणै: क्षत्रियैर्वैश्यै: स्वकर्मनिरतै: सदा।
जितेन्द्रियैर्महोत्साहैर्वृतामार्यै: सहस्रश:॥ ४१॥
प्रासादैर्विविधाकारैर्वृतां वैद्यजनाकुलाम्।
कच्चित् समुदितां स्फीतामयोध्यां परिरक्षसे॥ ४२॥ | | | | | | अनुवाद | | 'पिताजी! अयोध्या हमारे वीर पूर्वजों की निवासभूमि है; यह अपने नाम के अनुरूप ही उत्तम है। इसके द्वार चारों ओर से सुदृढ़ हैं। यह हाथियों, घोड़ों और रथों से परिपूर्ण है। हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने-अपने कर्मों में तत्पर होकर सदैव वहाँ निवास करते हैं। ये सभी अत्यंत उत्साही, संयमी और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकार के राजभवन और मंदिर इसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी विद्वानों से परिपूर्ण है। ऐसी समृद्ध और वैभवशाली अयोध्या नगरी की आप भली-भाँति रक्षा करते हैं न?॥40-42॥ | | | | ‘Father! Ayodhya is the abode of our brave ancestors; it is as good as its name. Its gates are strong from all sides. It is full of elephants, horses and chariots. Thousands of Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas, engaged in their respective duties, always reside there. All of them are very enthusiastic, self-controlled and excellent. Various types of royal palaces and temples enhance its beauty. That city is filled with a large number of scholars. You protect such a prosperous and prosperous city of Ayodhya very well, don't you?॥ 40-42॥ | | ✨ ai-generated | | |
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