श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.100.38 
कच्चिन्न लोकायतिकान् ब्राह्मणांस्तात सेवसे।
अनर्थकुशला ह्येते बाला: पण्डितमानिन:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! क्या आप कभी नास्तिक ब्राह्मणों की संगति करते हैं? क्योंकि वे मन को अध्यात्म से विमुख करने में कुशल होते हैं और वास्तव में अज्ञानी होते हुए भी अपने को बहुत विद्वान् मानते हैं ॥38॥
 
‘Father! Do you ever keep company with atheist Brahmins? Because they are skilled in distracting the mind from spirituality and despite being actually ignorant, they consider themselves to be very learned. ॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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