| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना » श्लोक 35 |
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| | | | श्लोक 2.100.35  | कच्चिज्जानपदो विद्वान् दक्षिण: प्रतिभानवान्।
यथोक्तवादी दूतस्ते कृतो भरत पण्डित:॥ ३५॥ | | | | | | अनुवाद | | भरत! आपने जिसे दूत नियुक्त किया है, वह अपने देश का ही निवासी, विद्वान, कुशल, गुणवान, जो कुछ उससे कहा जाए, वही कहता है और उचित-अनुचित का निर्णय करने वाला है, है न?॥ 35॥ | | | | ‘Bharata! The man you have appointed as the ambassador is a native of his own country, learned, skilful, talented, says whatever is told to him, and is endowed with the right and wrong judgment, isn't he?॥ 35॥ | | ✨ ai-generated | | |
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