| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना » श्लोक 30 |
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| | | | श्लोक 2.100.30  | कच्चिद् धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान् मतिमान् शुचि:।
कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्ष: सेनापति: कृत:॥ ३०॥ | | | | | | अनुवाद | | 'क्या तूने ऐसे पुरुष को सेनापति बनाया है जो सदैव सन्तुष्ट, वीर, धैर्यवान, बुद्धिमान, धर्मात्मा, कुलीन, आत्म-प्रेमी और युद्ध-कुशल हो?' 30॥ | | | | 'Have you made a man who is always content, brave, patient, intelligent, pious, noble, self-loving and skilled in warfare as the commander? 30॥ | | ✨ ai-generated | | |
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