श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.100.27 
कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजिता: प्रजा:।
राष्ट्रे तवावजानन्ति मन्त्रिण: कैकयीसुत॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'कैकेयकुमार! क्या आपके राज्य की प्रजा आपके मन्त्रियों के कठोर दण्ड से अत्यन्त दुःखी होकर उनका तिरस्कार नहीं करती?' 27॥
 
'Kaikayikumar! Don't the people of your kingdom despise your ministers, being extremely distressed by the harsh punishment? 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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