श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.100.21 
कच्चिन्न तर्कैर्युक्त्या वा ये चाप्यपरिकीर्तिता:।
त्वया वा तव वामात्यैर्बुध्यते तात मन्त्रितम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! यदि आप या आपके मंत्रीगण अपने निश्चय किए हुए विचार प्रकट न भी करें, तो क्या अन्य लोग युक्ति और तर्क से उन्हें जान लेते हैं? (और क्या आप और आपके मंत्रीगण दूसरों के गुप्त विचार भी जान लेते हैं न?)॥21॥
 
‘Father! Even if you or your ministers do not reveal your decided thoughts, do other people come to know about them through reasoning and logic? (And do you and your ministers keep getting to know the secret thoughts of others, don't you?)॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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