श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.100.18 
कच्चिन्मन्त्रयसे नैक: कच्चिन्न बहुभि: सह।
कच्चित् ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
(कोई भी गुप्त मंत्रणा दो-चार कानों तक ही गुप्त रहती है; छः कानों तक पहुँचते ही वह प्रकट हो जाती है, इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूँ -) क्या आप किसी गहन विषय पर अकेले चर्चा करते हैं? अथवा बहुत से लोगों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करते हैं? क्या ऐसा होता है कि आपके द्वारा निश्चित की गई गुप्त मंत्रणा प्रकट होकर शत्रु के राज्य तक फैल जाती है?॥18॥
 
‘(Any secret advice remains secret only between two to four ears; as soon as it reaches six ears, it is leaked, so I am asking you –) Do you discuss any deep topic alone? Or do you sit with many people and discuss it? Does it happen that the secret advice decided by you gets leaked and spreads to the enemy's kingdom?॥ 18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd