| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना » श्लोक 15 |
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| | | | श्लोक 2.100.15  | कच्चिदात्मसमा: शूरा: श्रुतवन्तो जितेन्द्रिया:।
कुलीनाश्चेङ्गितज्ञाश्च कृतास्ते तात मन्त्रिण:॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘पिताजी! क्या आपने केवल उन्हीं पुरुषों को अपना मंत्री बनाया है जो वीर हैं, शास्त्रों के ज्ञाता हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में किए हुए हैं, कुलीन कुल के हैं और अपने हाव-भाव से ही विचारों को समझ लेते हैं?॥15॥ | | | | ‘Father, have you appointed as your ministers only those persons who are brave, learned in scriptures, have controlled their senses, belong to a noble family and are able to understand the thoughts just by their outward gestures?॥ 15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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