श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 7-8h
 
 
श्लोक  2.10.7-8h 
तया तान्यपविद्धानि माल्यान्याभरणानि च॥ ७॥
अशोभयन्त वसुधां नक्षत्राणि यथा नभ:।
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार बिखरे हुए तारे आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार वे बिखरे हुए हार और आभूषण धरती की शोभा बढ़ा रहे थे।
 
Just as scattered stars enhance the beauty of the sky, in the same way those scattered garlands and ornaments were enhancing the beauty of the ground. 7 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)