श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 6-7h
 
 
श्लोक  2.10.6-7h 
ततश्चित्राणि माल्यानि दिव्यान्याभरणानि च॥ ६॥
अपविद्धानि कैकेय्या तानि भूमिं प्रपेदिरे।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् केकय राजकुमारी ने अपनी विचित्र मालाएँ और दिव्य आभूषण उतारकर फेंक दिए। वे सभी आभूषण भूमि पर इधर-उधर पड़े रहे।
 
Thereafter the Kekaya princess took off her strange garlands and divine ornaments and threw them away. All those ornaments were lying here and there on the ground. 6 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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