श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.10.39 
किमायासेन ते भीरु उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शोभने।
तत्त्वं मे ब्रूहि कैकेयि यतस्ते भयमागतम्।
तत् ते व्यपनयिष्यामि नीहारमिव रश्मिवान्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
भीरु! इतना कष्ट और इतना परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है? शोभने! उठो, उठो। कैकेयी! मुझे ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किससे क्या भय है? जैसे सूर्य अपनी किरणों से कोहरे को दूर कर देता है, वैसे ही मैं भी तुम्हारे भय को पूर्णतः दूर कर दूँगा॥ 39॥
 
‘Bhiru! What is the need to suffer so much and make so much effort? Shobhane! Get up, get up. Kaikeyi! Tell me exactly, from whom have you got what fear? Just like the sun with rays dispels the fog, in the same way I will completely dispel your fear.’॥ 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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