श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 35-36h
 
 
श्लोक  2.10.35-36h 
बलमात्मनि जानन्ती न मां शङ्कितुमर्हसि॥ ३५॥
करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे।
 
 
अनुवाद
'यद्यपि आप मेरी शक्ति जानते हैं, फिर भी मुझ पर संदेह न करें। मैं अपने अच्छे कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं वही करूँगा जो आपको अच्छा लगेगा।' 35 1/2
 
‘You should not doubt me even though you know my strength. I swear by my good deeds that I will do whatever pleases you. 35 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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