श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  2.10.32-33 
मा रौत्सीर्मा च कार्षीस्त्वं देवि सम्परिशोषणम्॥ ३२॥
अवध्यो वध्यतां को वा वध्य: को वा विमुच्यताम्।
दरिद्र: को भवेदाढॺो द्रव्यवान् वाप्यकिंचन:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे देवि! रोओ मत, शरीर मत सुखाओ; तुम्हारी इच्छानुसार आज कौन-सा अजेय मारा जाए? अथवा कौन-सा मृत्युदंड के योग्य अपराधी मुक्त किया जाए? कौन-सा दरिद्र धनवान बनाया जाए और कौन-सा धनवान दरिद्र बनाया जाए?॥ 32-33॥
 
Goddess! Do not cry, do not dry your body; as per your wish, which invulnerable person should be killed today? Or which criminal who deserves death penalty should be set free? Which poor person should be made rich and which rich person should be made poor?॥ 32-33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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