श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 3-4h
 
 
श्लोक  2.10.3-4h 
सा दीना निश्चयं कृत्वा मन्थरावाक्यमोहिता।
नागकन्येव नि:श्वस्य दीर्घमुष्णं च भामिनी॥ ३॥
मुहूर्तं चिन्तयामास मार्गमात्मसुखावहम्।
 
 
अनुवाद
मन्थरा के वचनों से मोहित और दीन हुई भामिनी कैकेयी ने उपर्युक्त निश्चय करके नागकन्या की भाँति गर्म और लंबी साँसें खींचनी शुरू कर दीं और दो घड़ी तक अपने लिए सुखद मार्ग सोचती रहीं॥3 1/2॥
 
Bhamini Kaikeyi, who was fascinated and humbled by the words of Manthara, made the above decision and started drawing hot and long breaths like a snake girl and kept thinking of a pleasant path for herself for two hours. 3 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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