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श्लोक 2.10.28  |
न तेऽहमभिजानामि क्रोधमात्मनि संश्रितम्।
देवि केनाभियुक्तासि केन वासि विमानिता॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| 'देवी! मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि आप मुझ पर क्रोधित हैं। फिर किसने आपका अपमान किया है? किसने आपकी निंदा की है? |
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| ‘Devi! I cannot believe that you are angry with me. Then who has insulted you? Who has slandered you? |
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