श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.10.25 
किन्नरीमिव निर्धूतां च्युतामप्सरसं यथा।
मायामिव परिभ्रष्टां हरिणीमिव संयताम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वह स्वर्ग से गिरी हुई किन्नरी, स्वर्गलोक से गिरी हुई अप्सरा, लक्ष्य से भटकी हुई माया और जाल में फँसी हुई हिरणी के समान प्रतीत हो रही थी॥ 25॥
 
She appeared like a Kinnari fallen from heaven, an Apsara fallen from the heavenly abode, an illusion lost from its target and a deer trapped in a net.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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