श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  2.10.23-24 
स वृद्धस्तरुणीं भार्यां प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥ २३॥
अपाप: पापसंकल्पां ददर्श धरणीतले।
लतामिव विनिष्कृत्तां पतितां देवतामिव॥ २४॥
 
 
अनुवाद
राजा वृद्ध थे और उनकी पत्नी जवान थी, इसलिए वे उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय समझते थे। राजा के मन में कोई पाप नहीं था; परन्तु कैकेयी के मन में पाप था। उन्होंने उसे कटी हुई लता के समान पृथ्वी पर पड़ी हुई देखा - मानो कोई दिव्य अप्सरा स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर पड़ी हो ॥23-24॥
 
The king was old and his wife was young, so he considered her more precious than his life. The king had no sin in his heart; but Kaikeyi had sinful intentions in her mind. He saw her lying on the earth like a cut creeper - as if some celestial nymph had fallen from heaven to the earth. ॥23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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