श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  2.10.15-16h 
दान्तराजतसौवर्णै: संवृतं परमासनै:।
विविधैरन्नपानैश्च भक्ष्यैश्च विविधैरपि॥ १५॥
उपपन्नं महार्हैश्च भूषणैस्त्रिदिवोपमम्।
 
 
अनुवाद
हाथीदांत, चाँदी और सोने से बने उत्तम सिंहासन थे। महल नाना प्रकार के भोजन, पेय और खाने-पीने की वस्तुओं से भरा हुआ था। बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित, कैकेयी का महल स्वर्ग के समान प्रतीत हो रहा था।
 
There were excellent thrones made of ivory, silver and gold. The palace was filled with various kinds of food, drinks and various eatables. Adorned with precious ornaments, Kaikeyi's palace looked like heaven. 15 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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