श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  2.10.11-12h 
स कैकेय्या गृहं श्रेष्ठं प्रविवेश महायशा:॥ ११॥
पाण्डुराभ्रमिवाकाशं राहुयुक्तं निशाकर:।
 
 
अनुवाद
उस परम तेजस्वी राजा ने सबसे पहले कैकेयी के उत्तम घर में प्रवेश किया, मानो श्वेत मेघों से युक्त राहु से भरे आकाश में चन्द्रमा ने पदार्पण किया हो ॥11 1/2॥
 
That most illustrious king first entered the noble house of Kaikeyi, as if the moon had made its debut in the sky full of Rahu with white clouds. 11 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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