श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.10.1 
विदर्शिता यदा देवी कुब्जया पापया भृशम्।
तदा शेते स्म सा भूमौ दिग्धविद्धेव किंनरी॥ १॥
 
 
अनुवाद
जब पापी कुब्जा ने देवी कैकेयी को बहुत सी गलत बातें समझाईं, तब वह विषैले बाण से बिंधी हुई किन्नरी के समान भूमि पर लोटने लगी।
 
When the sinful Kubja explained many wrong things to Goddess Kaikeyi, then she started rolling on the ground like a Kinnari pierced by a poisonous arrow.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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