| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार » श्लोक 45 |
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| | | | श्लोक 2.1.45  | आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च।
प्राप्ते काले स धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृप:॥ ४५॥ | | | | | | अनुवाद | | तदनन्तर, जब उपयुक्त समय आया, तब धर्मात्मा राजा दशरथ ने अपने तथा प्रजा के कल्याण के लिए अपने मंत्रियों को शीघ्रतापूर्वक श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारी करने का आदेश दिया। उनके हृदय का प्रेम तथा प्रजा के प्रति उनका स्नेह भी इस शीघ्रता का कारण था। 45॥ | | | | Thereafter, when the opportune time came, the righteous King Dashrath ordered his ministers to quickly prepare for the coronation of Shri Ram for the welfare of himself and his people. The love of his heart and his affection for his people were also the reason for this haste. 45॥ | | ✨ ai-generated | | |
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