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श्लोक 2.1.40  |
महीमहमिमां कृत्स्नामधितिष्ठन्तमात्मजम्।
अनेन वयसा दृष्ट्वा यथा स्वर्गमवाप्नुयाम्॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| 'इसी आयु में मैं अपने पुत्र श्री राम को सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज्य करते हुए देखूँ और समय आने पर सुखपूर्वक स्वर्ग को प्राप्त करूँ; यही मेरे जीवन की अभिलाषा है।'॥40॥ |
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| 'At this very age, I should see my son Sri Ram ruling over the entire earth and attain heaven happily in due time; this is the desire of my life.'॥ 40॥ |
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