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श्लोक 2.1.37  |
एषा ह्यस्य परा प्रीतिर्हृदि सम्परिवर्तते।
कदा नाम सुतं द्रक्ष्याम्यभिषिक्तमहं प्रियम्॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| उनके हृदय में यह महान् इच्छा बार-बार घूमती रहती थी कि वे अपने प्रिय पुत्र श्री राम का राज्याभिषेक कब देखेंगे। |
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| The great desire of his heart kept revolving again and again as to when he would witness the coronation of his beloved son, Sri Rama. 37. |
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