श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.1.24 
दृढभक्ति: स्थिरप्रज्ञो नासद्‍ग्राही न दुर्वच:।
निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
गुरुजनों के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा थी। वे बुद्धिमान थे और कभी मिथ्या बातें ग्रहण नहीं करते थे। उनके मुख से कभी अपशब्द नहीं निकलते थे। वे आलस्य से रहित, प्रमाद से रहित थे और अपने तथा दूसरों के दोषों को भली-भाँति जानते थे। 24॥
 
He had strong devotion towards his teachers. He was wise and never accepted false things. Bad words never came out of his mouth. He was free from laziness, free from carelessness and was well aware of his own and other people's faults. 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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