श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 8: राजा दशरथ का पुत्र के लिये अश्वमेधयज्ञ का प्रस्ताव और मन्त्रियों तथा ब्राह्मणों द्वारा उनका अनुमोदन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.8.2 
चिन्तयानस्य तस्यैवं बुद्धिरासीन्महात्मन:।
सुतार्थं वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
उसकी चिंता करते-करते एक दिन महामनस्वी राजा के मन में यह विचार आया कि क्यों न मैं पुत्र प्राप्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ करूं?
 
While worrying about him, one day the great-minded king got this idea in his mind that why should I not perform Ashwamedha Yajna to get a son?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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