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श्लोक 1.68.12  |
प्रतिज्ञां मम राजेन्द्र निर्वर्तयितुमर्हसि।
पुत्रयोरुभयोरेव प्रीतिं त्वमुपलप्स्यसे॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| 'राजेन्द्र! कृपया यहाँ पधारें और मेरी प्रतिज्ञा पूरी करें। यहाँ आकर आपको अपने दोनों पुत्रों के विवाह से प्राप्त होने वाला सुख प्राप्त होगा।॥12॥ |
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| ‘Rajendra! Please come here and fulfill my promise. By coming here you will get the happiness resulting from the marriage of both your sons.॥ 12॥ |
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