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श्लोक 1.67.14  |
इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना।
यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| 'अच्छा, अब मैं इस दिव्य एवं महान धनुष पर हाथ रखूँगा। इसे उठाने और इस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का भी प्रयत्न करूँगा।'॥14॥ |
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| 'Okay, now I will put my hands on this divine and great bow. I will also try to lift it and string it.'॥ 14॥ |
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