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ramayan 1.65.7: फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मण से कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपने मौन व्रत का अक्षरशः पालन किया। इसके बाद उन्होंने पुनः पहले की तरह बिना श्वास लिए मौन व्रत का अनुष्ठान आरम्भ कर दिया।   |   ramayan सर्ग 1.65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.65.7 
न किंचिदवदद् विप्रं मौनव्रतमुपास्थित:।
तथैवासीत् पुनर्मौनमनुच्छ्वासं चकार ह॥ ७॥
 
 
अनुवाद
फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मण से कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपने मौन व्रत का अक्षरशः पालन किया। इसके बाद उन्होंने पुनः पहले की तरह बिना श्वास लिए मौन व्रत का अनुष्ठान आरम्भ कर दिया।
 
Still he did not say anything to that Brahmin. He followed his vow of silence in letter and spirit. After this, he again started the ritual of observing silence without breathing as before. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)