श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.65.39 
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिप:।
प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्याय: सबान्धव:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
उस समय विदेहनिवासी मिथिला नरेश जनक ने महर्षि विश्वामित्र से उपर्युक्त वचन कहकर अपने उपाध्याय तथा बन्धु-बान्धवों के साथ शीघ्रतापूर्वक उनकी परिक्रमा की और वहाँ से चले गये॥39॥
 
At that time, King Janaka of Videha, the king of Mithila, having told the above mentioned words to the great sage Vishwamitra, quickly circumambulated him along with his Upadhyaya and friends. Then he left from there.॥ 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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