श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.65.35 
अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं च ते बलम्।
अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे कुशिकानंदन! आपकी तपस्या अपरिमित है, आपका बल अनंत है और आपके पुण्य भी सदैव माप और गणना से परे हैं॥ 35॥
 
'O Kushikanandan! Your austerity is immeasurable, your strength is endless and your virtues are also always beyond measurement and count.॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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