श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.65.29 
एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तप:।
एष धर्म: परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी सम्पूर्ण ऋषियों में श्रेष्ठ हैं, ये तप के साक्षात् स्वरूप हैं, उत्तम धर्म के स्वरूप हैं और वीरता के परम निधि हैं॥29॥
 
Raghunandan! This Vishwamitraji is the best among all the sages, he is the embodiment of penance, the embodiment of good religion and the ultimate treasure of bravery. 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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