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ramayan 1.65.17-18h: जैसे पूर्वकाल में प्रलय की अग्नि ने समस्त त्रिलोकी को जला डाला था, वैसे ही यह भी सबको जलाकर भस्म कर देगा। यदि यह देवताओं का राज्य पाना चाहता है, तो वह भी इसे दिया जाए। इसके मन में जो भी इच्छा हो, वह पूरी की जाए।   |   ramayan सर्ग 1.65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  1.65.17-18h 
कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम्॥ १७॥
देवराज्यं चिकीर्षेत दीयतामस्य यन्मन:।
 
 
अनुवाद
जैसे पूर्वकाल में प्रलय की अग्नि ने समस्त त्रिलोकी को जला डाला था, वैसे ही यह भी सबको जलाकर भस्म कर देगा। यदि यह देवताओं का राज्य पाना चाहता है, तो वह भी इसे दिया जाए। इसके मन में जो भी इच्छा हो, वह पूरी की जाए।
 
‘Just as in the past, the fire of Pralaya (destruction) had burnt the entire Triloki, similarly, he will also burn and reduce everyone to ashes. If he wants to get the kingdom of the gods, then that should also be given to him. Whatever desire he has in his mind, it should be fulfilled.’
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)