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ramayan 1.65.14: समुद्र व्याकुल हो रहे हैं, पर्वत फट रहे हैं, पृथ्वी डोल रही है और भयंकर तूफान चलने लगा है॥14॥   |   ramayan सर्ग 1.65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.65.14 
सागरा: क्षुभिता: सर्वे विशीर्यन्ते च पर्वता:।
प्रकम्पते च वसुधा वायुर्वातीह संकुल:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
समुद्र व्याकुल हो रहे हैं, पर्वत फट रहे हैं, पृथ्वी डोल रही है और भयंकर तूफान चलने लगा है॥14॥
 
‘The oceans are agitated, the mountains are being split, the earth is shaking and a fierce storm has started to blow.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)