श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  1.65.12-13 
नह्यस्य वृजिनं किंचिद् दृश्यते सूक्ष्ममप्युत।
न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम्॥ १२॥
विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम्।
व्याकुलाश्च दिश: सर्वा न च किंचित् प्रकाशते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'हमें उनमें किंचितमात्र भी दोष नहीं दिखाई देता। यदि उन्हें उनकी इच्छित वस्तु न दी गई, तो वे अपनी तपस्या से समस्त जीव-जंतुओं सहित तीनों लोकों का नाश कर देंगे। इस समय समस्त दिशाएँ धुएँ से ढकी हुई हैं, कहीं कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है।'
 
‘We do not see even the slightest fault in them. If they are not given their desired object, they will destroy the three worlds along with all living and non-living creatures by their penance. At this time all directions are covered with smoke, nothing can be seen anywhere.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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