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ramayan 1.64.18: 'अथवा मैं सौ वर्ष तक श्वास भी नहीं लूँगा। मैं इन्द्रियों को जीत लूँगा और इस शरीर को सुखा दूँगा।॥18॥   |   ramayan सर्ग 1.64: विश्वामित्र का रम्भा को शाप देकर पुनः घोर तपस्या के लिये दीक्षा लेना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 64: विश्वामित्र का रम्भा को शाप देकर पुनः घोर तपस्या के लिये दीक्षा लेना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.64.18 
अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि।
अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रिय:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'अथवा मैं सौ वर्ष तक श्वास भी नहीं लूँगा। मैं इन्द्रियों को जीत लूँगा और इस शरीर को सुखा दूँगा।॥18॥
 
‘Or I will not even breathe for a hundred years. I will conquer the senses and dry up this body.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)